Om Shanti
Om Shanti
कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो            सोच के बोलो, समझ के बोलो, सत्य बोलो            स्वमान में रहो, सम्मान दो             निमित्त बनो, निर्मान बनो, निर्मल बोलो             निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो      शुभ सोचो, शुभ बोलो, शुभ करो, शुभ संकल्प रखो          न दुःख दो , न दुःख लो          शुक्रिया बाबा शुक्रिया, आपका लाख लाख पद्मगुना शुक्रिया !!! 

राजयोग कोर्स ( पथ प्रदर्शनी )


मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलियाँ हल करते है और उसके फलस्वरूप इनाम पते है | परन्तु इस छोटी-सी पहेली का हल कोई नहीं जानता कि – “मैं कौन हूँ?” यों तो हर-एक मनुष्य सारा दिन “मैं...मैं ...” कहता ही रहता है, परन्तु यदि उससे पूछा जाय कि “मैं” कहने वाला कौन है? तो वह कहेगा कि--- “मैं कृष्णचन्द हूँ... या ‘मैं लालचन्द हूँ” | परन्तु सोचा जाय तो वास्तव में यह तो शरीर का नाम है, शरीर तो ‘मेरा’ है, ‘मैं’ तो शरीर से अलग हूँ | बस, इस छोटी-सी पहेली का प्रेक्टिकल हल न जानने के कारण, अर्थात स्वयं को न जानने के कारण, आज सभी मनुष्य देह-अभिमानी है और सभी काम, क्रोधादि विकारों के वश है तथा दुखी है |
अब परमपिता परमात्मा कहते है कि—“आज मनुष्य में घमण्ड तो इतना है कि वह समझता है कि—“मैं सेठ हूँ, स्वामी हूँ, अफसर हूँ....,” परन्तु उस में अज्ञान इतना है कि वह स्वयं को भी नहीं जानता | “मैं कौन हूँ, यह सृष्टि रूपी खेल आदि से अन्त तक कैसे बना हुआ है, मैं इस में कहाँ से आया, कब आया, कैसे आया, कैसे सुख- शान्ति का राज्य गंवाया तथा परमप्रिय परमपिता परमात्मा (इस सृष्टि के रचयिता) कौन है?” इन रहस्यों को कोई भी नहीं जानता | अब जीवन कि इस पहेली (Puzzle of life) को फिर से जानकर मनुष्य देही-अभिमानी बन सकता है और फिर उसके फलस्वरूप नर को श्री नारायण और नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति होती है और मनुष्य को मुक्ति तथा जीवनमुक्ति मिल जाती है | वह सम्पूर्ण पवित्रता, सुख एवं शान्ति को पा लेता है |
जब कोई मनुष्य दुखी और अशान्त होता है तो वह प्रभु ही से पुकार कर सकता है- “हे दुःख हर्ता, सुख-कर्ता, शान्ति-दाता प्रभु, मुझे शान्ति दो |” विकारों के वशीभूत हुआ-हुआ मुशी पवित्रता के लिए भी परमात्मा की ही आरती करते हुए कहता है- “विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा !” अथवा “हे प्रभु जी, हम सब को शुद्धताई दीजिए, दूर करके हर बुराई को भलाई दीजिए |” परन्तु परमपिता परमात्मा विकारों तथा बुराइयों को दूर करने के लिए जो ईश्वरीय ज्ञान देते है तथा जो सहज राजयोग सिखाते है, प्राय: मनुष्य उससे अपरिचित है और वे इनको व्यवहारिक रूप में धारण भी नहीं करते | परमपिता परमात्मा तो हमारा पथ-प्रदर्शन करते है और हमे सहायता भी देते है परन्तु पुरुषार्थ तो हमे स्वत: ही करना होगा, तभी तो हम जीवन में सच्चा सुख तथा सच्ची शान्ति प्राप्त करेंगे और श्रेष्ठाचारी बनेगे |
आगे परमपिता परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान एवं सहज राजयोग का पथ प्रशस्त किया गया है इसे चित्र में भी अंकित क्या गया है तथा साथ-साथ हर चित्र की लिखित व्याख्या भी दी गयी है ताकि ये रहस्य बुद्धिमय हो जायें | इन्हें पढ़ने से आपको बहुत-से नये ज्ञान-रत्न मिलेंगे | अब प्रैक्टिकल रीति से राजयोग का अभ्यास सीखने तथा जीवन दिव्य बनाने के लिए आप इस प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विधालय के किसी भी सेवा-केन्द्र पर पधार कर नि:शुल्क ही लाभ उठावें | 


+  आत्मा क्या है और मन क्या है ?
+  तीन लोक कौन से है और शिव का धाम कौन सा है ?
+  निराकार परम पिता परमात्मा और उनके दिव्य गुण
+  परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
+  परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
+  ‘निराकार’ का अर्थ
+  सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है
+  परमपिता परमात्मा और उनके दिव्य कर्तव्य
+  परमत्मा का दिव्य – अवतरण
+  शिव और शंकर में अन्तर
+  शिव का जन्मोत्सव रात्रि में क्यों ?
+  ज्ञान-सूर्य शिव के प्रकट होने से सृष्टि से अज्ञानान्धकार तथा विकारों का नाश
+  परमात्मा सर्व व्यापक नहीं है
+  सृष्टि रूपी उल्टा आ अदभुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा
+  प्रभु मिलन का गुप्त युग—पुरुषोतम संगम युग
+  मनुष्य के 84 जन्मों की अद्-भुत कहानी  
+  मनुष्यात्मा 84 लाख योनियाँ धारण नहीं करती
+  सृष्टि नाटक का रचयिता और निर्देशक कौन है
+  कलियुग अभी बच्चा नहीं है बल्कि बुढ़ा हो गया है
+  क्या रावण के दस सिर  थेरावण किसका प्रतीक है  ?
+  मनुष्य जीवन का लक्ष्य  क्या है  ?
+  निकट भविष्य में  श्रीकृष्ण  आ  रहे  है 
+  सर्वशास्त्र शिरोमणि श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान-दाता कौन है 
+  गीता-ज्ञान हिंसक युद्ध करने के लिए नहीं दिया गया था 
+  जीवन कमल पुष्प समान कैसे बनायें ?
+  राजयोग का आधार तथा विधि 
+  राजयोग से प्राप्ति--अष्ट शक्तियां 

       इस पथ-प्रदर्शनी में जो ईश्वरीय ज्ञान, व सहज राजयोग लिपि-बद्ध किया गया है, उसकी विस्तारपूर्वक शिक्षा प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विधालय में दी जाती है | ऊपर जो चित्र अंकित क्या गया है, वह उसके मुख्य शिक्षा-स्थान तथा मुख्य कार्यालय का है | इस ईश्वरीय विश्व-विधालय की स्थापना परमप्रिय परमपिता परमात्मा ज्योति-बिन्दु शिव ने 1937 में सिन्ध में की थी | परमपिता परमात्मा शिव परमधाम अर्थात ब्रह्मलोक से अवतरित होकर एक साधारण एवं वृद्ध मनुष्य के तन में प्रविष्ट हुए थे क्योंकि किसी मानवीय मुख का प्रयोग किए बिना निराकार परमात्मा अन्य किसी रीति से ज्ञान देते?
ज्ञान एवं सहज राजयोग के द्वारा सतयुग की स्थापनार्थ ज्योति-बिन्दु शिव का जिस मनुष्य के तन में ‘दिव्य प्रवेश’ अथवा दिव्य जन्म हुआ, उस मनुष्य को उन्होंने ‘प्रजापिता ब्रह्मा’- यह अलौकिक नाम दिया | उनके मुखार्विन्द द्वारा ज्ञान एवं योग की शिक्षा लेकर ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाले तथा पूर्ण पवित्रता का व्रत लेने वाले नर और नारियों को क्रमश: मुख-वंशी ‘ब्राह्मण’ तथा ‘ब्राह्मनियाँ’ अथवा ‘ब्रह्माकुमार’ और ब्रह्माकुमारियाँ’ कहा जाता है क्योंकि उनका आध्यात्मिक नव-जीवन ब्रह्मा के श्रीमुख द्वारा विनिसृत ज्ञान से हुआ |
परमपिता शिव तो त्रिकालदर्शी है; वे तो उनके जन्म-जन्मान्तर की जीवन कहानी को जानते थे कि यह ही सतयुग के आरम्भ में पूज्य श्री नारायण थे और समयान्तर में कलाएं कम होते-होते अब इस अवस्था को प्राप्त हुए थे | अत: इनके तन में प्रविष्ट होकर उन्होंने सन 1937 में इस अविनाशी ज्ञान-यज्ञ की अथवा ईश्वरीय विश्व-विधालय की 5000 वर्ष पहले की भांति, पुन: स्थापना की | इन्ही प्रजापिता ब्रह्मा को ही महाभारत की भाषा में ‘भगवान का रथ’ भी कहा जाता सकता है, ज्ञान-गंगा लाने के निमित बनने वाले ‘भागीरथ’ भी और ‘शिव’ वाहन ‘नन्दीगण’ भी |
जिस  मनुष्य के तन में परमात्मा शिव ने प्रवेश किया, वह उस समय कलकता में एक विख्यात जौहरी थे और श्री नारायण के अनन्य भक्त थे | उनमें उदारता, सर्व के कल्याण की भावना, व्यवहार-कुशलता, राजकुलोचित शालीनता और प्रभु मिलन की उत्कट चाह थी | उनके सम्बन्ध राजाओं-महाराजाओं से भी थे, समाज के मुखियों से भी और साधारण एवं निम्न वर्ग से भी खूब परिचित थे | अत: वे अनुभवी भी थे और उन दिनों उनमें भक्ति की पराकाष्ठा तथा वैराग्य की अनुकूल भूमिका भी थी |
अन्यश्च प्रवृति को दिव्य बनाने के लिए माध्यम भी प्रवृति मार्ग वाले ही व्यक्ति का होना उचित था | इन तथा अन्य अनेकानेक कारणों से त्रिकालदर्शी परमपिता शिव ने उनके तन में प्रवेश किया |
उनके मुख द्वारा ज्ञान एवं योग की शिक्षा लेने वाले सभी ब्रह्माकुमारों एवं ब्रह्माकुमारियों में जो श्रेष्ठ थी, उनका इस अलौकिक जीवन का नाम हुआ – जगदम्बा सरस्वती | वह ‘यज्ञ-माता’ हुई | उन्होंने ज्ञान-वीणा द्वारा जन-जन को प्रभु-परिचय देकर उनमें आध्यात्मिक जागृति लाई | उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया और सहज राजयोग द्वारा अनेक मनुष्यात्माओं की ज्योति जगाई | प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा सरस्वती ने पवित्र एवं दैवी जीं का आदर्श उपस्थित किया |

Avyakt Murli 26-8-12


26/08/12      Madhuban   Avyakt BapDada    Om Shanti     11/02/75

Dharna for the Pandavas who battle with Maya.
Do you experience in your life at the present time the specialities that the Pandavs have been remembered for from the previous cycle? VVhat is the significance of the memorial of the Pandavas having melted themselves on the mountain? In which aspect did they melt themselves? Memorials of something subtle are shown in a physical form. Just as there are physical memorials of those who have been in the living form, in the same Way, examples are given to clarify something subtle. Are you not able to make yourself an embodiment of success because of the obstacles that come to the efforts of you effort-makers? Or, do you repeatedly experience a lack of success due to a particular nature or sanskar, which you refer to as your original sanskar or nature. To melt your original sanskars means to melt yourself so that those who see you or come into contact with you feel that this soul has melted themselves. There is success in this.

अव्यक्त मुरली 26-8-12


2 6 -0 8 - 12   प्रात:मुरली  ओम् शान्ति  "अव्यक्त-बापदादा”  रिवाइज: 1 1 - 0 2 - 7 5 मधुबन

माया से युद्ध करने वाले पाण्डवों के लिए धारणायें

पाण्डवों के लिये जो कल्प पाले का गायन है, क्या वह सब विशेषताये वर्तमान समय जीवन में अनुभव होती हैं? यह जो गायन है कि उन्होंने पहाडों पर स्वयं को गलाया- इसका रहस्य क्या है? किस बात में गलाया? सूक्ष्म बात का ही यादगार स्थूल रूप में होता है। जैसे चैतन्य का यादगार स्थूल में होता है,  वैसे ही सूक्ष्म को स्पष्ट करने के लिये दृष्टान्त दिया जाता है । स्वयं को सफलता मूर्त बनाने के निमित्-पुरुषार्थियों के पुरूषार्थ में जो विघ्न सामने आते है, उन विघ्नों के कारण क्या  स्वयं को स्रफलतामूर्त नहीं बना सकते है? या बार-बार उसी स्वभाव व संस्कार के कारण असफलता होती है जिसको निजी संस्कार व नेचर कहा जाता है । तो ऐसे निजी संस्कारों को गलाना अर्थात स्वयं को गलाना जिससे देखने या सम्पर्क में आने वाले यह महसूस करें' कि इस आत्मा ने स्वयं को गलाया है । इसमें सफलता है !

निमित बन, निमित भाव से सेवा करो - pm dadi ji


Dadi Janki – 24th August 2012 - Shantivan Baba, Murli and Madhuban


Dadi Janki – 24th August 2012 - Shantivan
Baba, Murli and Madhuban
 
If you have Baba, Murli and Madhuban in your heart and mind, everything becomes easy. This is the proof of being Baba’s child.  Many tests and difficulties may come in front of you but one who smiles, even at the time of difficulties, will never have any difficulty.  I am a soul and I am Baba’s; I am an embodiment of peace and an embodiment of power and Baba has given us the knowledge of this drama. Understanding the knowledge of the drama makes us cheerful; by belonging to Baba we receive power and by being soul conscious we become the embodiment of peace and power. 
 

Dadi Janki – 25.8.12 – Shantivan Happy, intoxicated and lost in Baba’s love


Dadi Janki – 25.8.12 – Shantivan
Happy, intoxicated and lost in Baba’s love
 
All of you are sitting in Dadiji’s love. Dadiji has given all of you so much love and so what return will you give? Dadi had truthfulness, honesty and simplicity in every aspect of her life. We should be so honest and do yagya service. We put our hand in Baba’s and we give the proof in the service we do.
 
Dadi spoke the murli when Baba became avyakt and gave a lot of sustenance through that. Our sweet Dadi created such a strong sense of belonging in the family. I would say to Dadiji, ‘Dadi, you are so sweet’ and Dadi would say: Baba is so sweet. There should be no pull to or from bodily relations nor from any old sanskars or nature. Spiritual love makes us real gold. Have a life like a diamond, be a true, flawless diamond – no defects, no stains. You have to become something yourself. Think to yourself: ‘I have to become real gold! This will happen through the power of knowledge and remembrance, which will remove the alloy from the soul. 
 

ज्ञान योग के बल से दादी समान सच्चा बेदाग़ हीरा बनना है - दादी जानकी


LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...