कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो            सोच के बोलो, समझ के बोलो, सत्य बोलो            स्वमान में रहो, सम्मान दो             निमित्त बनो, निर्मान बनो, निर्मल बोलो             निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो      शुभ सोचो, शुभ बोलो, शुभ करो, शुभ संकल्प रखो          न दुःख दो , न दुःख लो          शुक्रिया बाबा शुक्रिया, आपका लाख लाख पद्मगुना शुक्रिया !!! 

Vices to Virtues: 73: संस्कार परिवर्तन


Vices to Virtues: 73: संस्कार परिवर्तन




Bapdada has told us to cremate our old sanskars. (Sanskar ka sanskar karo) Not just to suppress them, but to completely burn them, so there is no trace or progeny left. Check and change now. Have volcanic yoga (Jwala swaroop) Let us work on one each day.


बापदादा ने कहा है के ज्वाला  मुखी  अग्नि  स्वरुप  योग  की  शक्ति  से  संस्कारों  का संस्कार करो ; सिर्फ मारना नहींलेकिन  जलाकर नाम रूप ख़त्म कर दो.... चेक और चेन्ज करना ... ज्वाला योग से अवगुण और पुराने संस्कार जला देना ...हररोज़ एक लेंगे और जला देंगे...


पुराने वा अवगुणो का अग्नि ....   ७३..........बेहमानी करना बेवफा बनना .....बदलकर....  मैं आत्मा,  स्वच्च्छ बुद्धि सत्यता की देवी  हूँ........


cremate our old sanskars:  73......... to cheat, to be disloyal.......... replace them by....I, the soul with a clean intellect, am the deity of truth....


Poorane va avguno ka agni sanskar.... 73....bemaani karna, bewafa banna...........badalkar.... mai atma, swachchh buddhi satyata ki devi   hun.........



पुराने वा अवगुणो का अग्नि ....   ७३.....बेहमानी करना , बेवफा बनना .....बदलकर....  मैं आत्मा,  स्वच्च्छ बुद्धि सत्यता की देवी  हूँ........


मैं आत्मा परमधाम शान्तिधाम शिवालय में हूँ ....... शिवबाबा के साथ हूँ ..... समीप हूँ .... समान हूँ ..... सम्मुख हूँ .....  सेफ हूँ ..... बाप की छत्रछाया में हूँ .....अष्ट इष्ट महान सर्व श्रेष्ठ हूँ ...... मैं आत्मा मास्टर ज्ञानसूर्य हूँ .... मास्टर रचयिता हूँ ..... मास्टर महाकाल हूँ ..... मास्टर सर्व शक्तिवान हूँ ..... शिव शक्ति कमबाइनड  हूँ  ........ अकालतक्खनशीन  हूँ ....अकालमूर्त हूँ ..... अचल अडोल अंगद एकरस एकटिक एकाग्र स्थिरियम अथक और बीजरूप  हूँ ........ शक्तिमूर्त ..... संहारनीमूर्त ...... अलंकारीमूर्त ..... कल्याणीमूर्त हूँ ......शक्ति सेना हूँ ..... शक्तिदल हूँ ...... सर्वशक्तिमान हूँ ......  रुहे गुलाब .... जलतीज्वाला .... ज्वालामुखी ....  ज्वालास्वरूप .... ज्वालाअग्नि हूँ .... बेहमानी करना , बेवफा बनना.................अवगुणों का आसुरी संस्कार का अग्नि संस्कार कर रही हूँ ........ जला रही हूँ ...... भस्म कर रही हूँ ......  मैं आत्मा महारथी महावीर ........ बेहमानी करना , बेवफा बनना........................ के  मायावी संस्कार पर विजयी रूहानी सेनानी हूँ .......... मैं आत्मा, स्वच्च्छ बुद्धि सत्यता की देवी  हूँ.... मैं देही -अभिमानी ..... आत्म-अभिमानी..... रूहानी अभिमानी .....परमात्म अभिमानी..... परमात्म ज्ञानी ..... परमात्म भाग्यवान..... सर्वगुण सम्पन्न  ..... सोला  कला सम्पूर्ण ..... सम्पूर्ण निर्विकारी .....मर्यादा पुरुषोत्तम  ...... डबल अहिंसक  हूँ ..... डबल ताजधारी ..... विष्व  का मालिक हूँ ..... मैं आत्मा ताजधारी ..... तख़्तधारी ..... तिलकधारी ..... दिलतक्खनशीन  ..... डबललाइट ..... सूर्यवंशी शूरवीर ....... महाबली महाबलवान ..... बाहुबलि पहलवान ....... अष्ट भुजाधारी अष्ट शक्तिधारी   अस्त्र शस्त्रधारी शिवमई शक्ति हूँ .....



cremate our old sanskars:  73......... to cheat, to be disloyal.......... replace them by....I, the soul with a clean intellect, am the deity of truth....


I am a soul...I reside in the Incorporeal world...the land of peace...Shivalaya...I am with the Father...I am close to the Father...I am equal to the Father...I am sitting personally in front of the Father...safe...in the canopy of protection of the Father...I am the eight armed deity...a  special deity...I am great and elevated...I, the soul am the master sun of knowledge...a master creator...master lord of death...master almighty authority... Shivshakti combined...immortal image...seated on an immortal throne...immovable, unshakable Angad, stable in one stage, in a constant stage, with full concentration....steady, tireless and a seed...the embodiment of power...the image of a destroyer...an embodiment of ornaments...the image of a bestower...the Shakti Army...the Shakti  troop...an almighty authority...the spiritual rose...a blaze...a volcano...an embodiment of a blaze...a fiery blaze...I am cremating the sanskar of   cheating, being disloyal....I am burning them...I am turning them into ashes...I, the soul am a maharathi...a mahavir...I am the victorious spiritual soldier that is conquering the vice of  cheating, being disloyal.................. I, the soul with a clean intellect, am the deity of truth................I, the soul, am soul conscious, conscious of the soul, spiritually conscious, conscious of the Supreme Soul, have knowledge of the Supreme Soul, am fortunate for knowing the Supreme Soul.....I am full of all virtues, 16 celestial degrees full, completely vice less, the most elevated human being following the code of conduct, doubly non-violent, with double crown...I am the master of the world, seated on a throne, anointed with a tilak, seated on Baba’s heart throne, double light, belonging to the sun dynasty, a valiant warrior, an  extremely powerful and  an extremely strong wrestler with very strong arms...eight arms, eight powers, weapons and armaments, I am the Shakti merged in Shiv...



Poorane va avguno ka agni sanskar.... 73....bemaani karna, bewafa banna...........badalkar.... mai atma, swachchh buddhi satyata ki devi   hun.........


mai atma paramdham shantidham, shivalay men hun...shivbaba ke saath hun...sameep hun...samaan hun...sammukh hun...safe hun...baap ki chhatra chaaya men hun...asht, isht, mahaan sarv shreshth hun...mai atma master gyan surya hun...master rachyita hun...master mahakaal hun...master sarv shakti vaan hun...shiv shakti combined hun...akaal takht nasheen hun...akaal moort hun...achal adol angad ekras ektik ekagr sthiriom athak aur beej roop hun...shaktimoort hun...sanharinimoort hun...alankarimoort hun...kalyani moort hun...shakti sena hun...shakti dal hun...sarvshaktimaan hun...roohe gulab...jalti jwala...jwala mukhi...jwala swaroop...jwala agni hun... .... bemaani karna, bewafa banna.....avguno ka asuri sanskar kar rahi hun...jala rahi hun..bhasm kar rahi hun...mai atma, maharathi mahavir .... bemaani karna, bewafa banna...............ke mayavi sanskar par vijayi ruhani senani hun... mai atma,  swachchh buddhi satyata ki devi   hun.................mai dehi abhimaani...atm abhimaani...ruhani abhimaani...Parmatm abhimaani...parmatm gyaani...parmatm bhagyvaan...sarvagunn sampann...sola kala sampoorn...sampoorn nirvikari...maryada purushottam...double ahinsak hun...double tajdhaari vishv ka malik hun...mai atma taj dhaari...takht dhaari...tilak dhaari...diltakhtnasheen...double light...soorya vanshi shoorvir...mahabali mahabalwaan...bahubali pahalwaan...asht bhujaadhaari...asht shakti dhaari...astr shastr dhaari shivmai shakti hun... 


18-04-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति बापदादा मधुबन



18-04-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति बापदादा मधुबन
 

मीठे बच्चे - तुम्हारा यह ब्राह्मण कुल बिल्कुल निराला हैतुम ब्राह्मण ही नॉलेजफुल हो,तुम ज्ञानविज्ञान और अज्ञान को जानते हो ।

प्रश्न:- किस सहज पुरूषार्थ से तुम बच्चों की दिल सब बातों से हटती जायेगी?

उत्तर:- सिर्फ रूहानी धन्धे में लग जाओजितना जितना रूहानी सर्विस करते रहेंगे उतना और सब बातों से स्वतः दिल हटती जायेगी। राजाई लेने के पुरूषार्थ में लग जायेंगे। परन्तु रूहानी सर्विस के साथ साथ जो रचना रची हैउसकी भी सम्भाल करनी है।

गीतः जो पिया के साथ है ...... 

ओम् शान्ति।
पिया कहा जाता है बाप को। अब बाप के आगे तो बच्चे बैठे हैं। बच्चे जानते हैं हम कोई साधू सन्यासी आदि के आगे नहीं बैठे हैं। वह बाप ज्ञान का सागर हैज्ञान से ही सद्गति होती है। कहा जाता है ज्ञानविज्ञान और अज्ञान। विज्ञान अर्थात् देही अभिमानी बननायाद की यात्रा में रहना और ज्ञान अर्थात् सृष्टि चक्र को जानना। ज्ञानविज्ञान और अज्ञान  इसका अर्थ मनुष्य बिल्कुल नहीं जानते हैं। अभी तुम हो संगमयुगी ब्राह्मण। तुम्हारा यह ब्राह्मण कुल निराला हैउनको कोई नहीं जानते। शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं कि ब्राह्मण संगम पर होते हैं। यह भी जानते हैं प्रजापिता ब्रह्मा होकर गया हैउसको आदि देव कहते हैं। आदि देवी जगत अम्बावह कौन है! यह भी दुनिया नहीं जानती। जरूर ब्रह्मा की मुख वंशावली ही होगी। वह कोई ब्रह्मा की स्त्री नहीं ठहरी। एडाप्ट करते हैं ना। तुम बच्चों को भी एडाप्ट करते हैं। ब्राह्मणों को देवता नहीं कहेंगे। यहाँ ब्रह्मा का मन्दिर हैवह भी मनुष्य है ना। ब्रह्मा के साथ सरस्वती भी है। फिर देवियों के भी मन्दिर हैं। सभी यहाँ के ही मनुष्य हैं ना। मन्दिर एक का बना दिया है। प्रजापिता की तो ढेर प्रजा होगी ना। अब बन रही है। प्रजापिता ब्रह्मा का कुल वृद्धि को पा रहा है। हैं एडाप्टेड धर्म के बच्चे। अब तुमको बेहद के बाप ने धर्म का बच्चा बनाया है। ब्रह्मा भी बेहद के बाप का बच्चा ठहराइनको भी वर्सा उनसे मिलता है। तुम पोत्रे पोत्रियों को भी वर्सा उनसे मिलता है। ज्ञान तो कोई के पास है नहीं क्योंकि ज्ञान का सागर एक हैवह बाप जब तक न आये तब तक किसकी सद्गति होती नहीं। अभी तुम भक्ति से ज्ञान में आये होसद्गति के लिए। सतयुग को कहा जाता है सद्गति। कलियुग को दुर्गति कहा जाता है क्योंकि रावण का राज्य है। सद्गति को रामराज्य भी कहते हैं। सूर्यवंशी भी कहते हैं। यथार्थ नाम सूर्यवंशीचन्द्रवंशी है। बच्चे जानते हैं हम ही सूर्यवंशी कुल के थेफिर 84 जन्म लियेयह नॉलेज कोई शास्त्रों में हो नहीं सकती क्योंकि शास्त्र हैं ही भक्ति मार्ग के लिए। वह तो सब विनाश हो जायेंगे। यहाँ से जो संस्कार ले जायेंगे वहाँ वह सब बनाने लग पड़ेंगे। तुम्हारे में भी संस्कार भरे जाते हैं राजाई के। तुम राजाई करेंगे वह (साइंसदान) फिर उस राजाई में आकरजो हुनर सीखते हैं वही करेंगे। जायेंगे जरूर सूर्यवंशीचन्द्रवंशी राजाई में। उनमें है सिर्फ साइन्स की नॉलेज। वे उसके संस्कार ले जायेंगे। वह भी संस्कार हैं। वह भी पुरूषार्थ करते हैंउनके पास वह इलम (विद्या) है। तुम्हारे पास दूसरा कोई इलम नहीं है। तुम बाप से राजाई लेंगे। धन्धे आदि में तो वह संस्कार रहते हैं ना। कितनी खिटपिट रहती है। परन्तु जब तक वानप्रस्थ अवस्था नहीं हुई है तो घरबार की सम्भाल भी करनी है। नहीं तो बच्चों की कौन सम्भाल करेंगे। यहाँ तो नहीं आकर बैठेंगे। ऐसे कहते हैं जब इस धन्धे में पूरी रीति लग जायेंगे फिर वह छूट सकता है। साथ में रचना को भी जरूर सम्भालना पड़ता है। हाँ कोई अच्छी रीति रूहानी सर्विस में लग जाते हैं फिर उनसे जैसे दिल उठ जायेगी। समझेंगे जितना टाइम इस रूहानी सर्विस में देवेंउतना अच्छा है। बाप आये हैं पतित से पावन बनने का रास्ता बतानेतो बच्चों को भी यही सर्विस करनी है। हर एक का हिसाब देखा जाता है। बेहद का बाप तो केवल पतित से पावन बनने की मत देते हैंवह पावन बनने का ही रास्ता बताते हैं। बाकी यह देख रेख करनाराय देना इनका धंधा हो जाता है। शिवबाबा कहते हैं मेरे से कोई बात धन्धे आदि की नहीं पूछनी है। मेरे को तुमने बुलाया है कि आकर पतित से पावन बनाओतो हम इन द्वारा तुमको बना रहा हूँ। यह भी बाप हैइनकी मत पर चलना पड़े। उनकी रूहानी मतइनकी जिस्मानी। इनके ऊपर भी कितनी रेसपॉन्सिबिल्टी रहती है। यह भी कहते रहते हैं कि बाप का फरमान है मामेकम् याद करो। बाप की मत पर चलो। बाकी बच्चों को कुछ भी पूछना पड़ता हैनौकरी में कैसे चलेंइन बातों को यह साकार बाबा अच्छी तरह समझा सकते हैंअनुभवी हैंयह बताते रहेंगे। ऐसे ऐसे मैं करता हूँइनको देख सीखना हैयह सिखाते रहेंगे क्योंकि यह है सबसे सब तूफान पहले इनके पास आते हैं इसलिए सबसे रूसतम यह हैतब तो ऊंच पद भी पाते हैं। माया रूसतम हो लड़ती है। इसने फट से सब कुछ छोड़ दियाइनका पार्ट था। बाबा ने इनसे यह करा दिया। करनकरावनहार तो वह है ना। खुशी से छोड़ दियासाक्षात्कार हो गया। अब हम विश्व के मालिक बनते हैं। यह पाई पैसे की चीज़ हम क्या करेंगे। विनाश का साक्षात्कार भी करा दिया। समझ गयेइस पुरानी दुनिया का विनाश होना है। हमको फिर से राजाई मिलती है तो फट से वह छोड़ दिया। अब तो बाप की मत पर चलना है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। ड्रामा अनुसार भट्ठी बननी थी। मनुष्य थोड़ेही समझते कि इतने यह सब क्यों भागे। यह कोई साधू सन्त तो नहीं। यह तो सिम्पुल हैइसने किसको भगाया भी नहीं। कृष्ण का चरित्र कोई है नहीं। मनुष्य मात्र की महिमा कोई है नहीं। महिमा है तो एक बाप की। बस। बाप ही आकर सबको सुख देते हैं। तुमसे बात करते हैं। तुम यहाँ किसके पास आये होतुम्हारी बुद्धि वहाँ भी जायेगीयहाँ भी क्योंकि जानते हो शिवबाबा रहने वाला वहाँ का है। अभी इनमें आये हैं। बाप से हमको स्वर्ग का वर्सा मिलना है। कलियुग के बाद जरूर स्वर्ग आयेगा। कृष्ण भी बाप से वर्सा लेकर जाए राजाई करते हैंइसमें चरित्र की बात ही नहीं। जैसे राजा के पास प्रिन्स पैदा होता हैस्कूल में पढ़कर फिर बड़ा होकर गद्दी लेगा। इसमें महिमा वा चरित्र की बात नहीं। ऊंच ते ऊंच एक बाप ही है। महिमा भी उनकी होती है! यह भी उनका परिचय देते हैं। अगर वह कहे मैं कहता हूँ तो मनुष्य समझेंगे यह अपने लिए कहते हैं। यह बातें तुम बच्चे समझते होभगवान को कभी भी मनुष्य नहीं कह सकते। वह तो एक ही निराकार है। परमधाम में रहते हैं। तुम्हारी बुद्धि ऊपर में भी जाती है फिर नीचे भी आती है।
बाबा दूरदेश से पराये देश में आकर हमको पढ़ाए फिर चले जाते हैं। खुद कहते हैं  मैं आता हूँ सेकेण्ड में। देरी नहीं लगती है। आत्मा भी सेकेण्ड में एक शरीर छोड़ दूसरे में जाती है। कोई देख न सके। आत्मा बहुत तीखी है। गाया भी हुआ है सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। रावण राज्य को जीवनबंध राज्य कहेंगे। बच्चा पैदा हुआ और बाप का वर्सा मिला। तुमने भी बाप को पहचाना और स्वर्ग के मालिक बनें फिर उसमें नम्बरवार मर्तबे हैं  पुरूषार्थ अनुसार। बाप बहुत अच्छी रीति समझाते रहते हैंदो बाप हैं  एक लौकिक और एक पारलौकिक। गाते भी हैं दुःख में सिमरण सब करेसुख में करे न कोई। तुम जानते हो हम भारतवासियों को जब सुख था तो सिमरण नहीं करते थे। फिर हमने 84 जन्म लिए। आत्मा में खाद पड़ती है तो डिग्री कम होती जाती है। 16 कला सम्पूर्ण फिर 2 कला कम हो जाती है। कम पास होने कारण राम को बाण दिखाया है। बाकी कोई धनुष नहीं तोड़ा है। यह एक निशानी दे दी है। यह हैं सब भक्ति मार्ग की बातें। भक्ति में मनुष्य कितना भटकते हैं। अब तुमको ज्ञान मिला हैतो भटकना बंद हो जाता है।
हे शिवबाबा कहना यह पुकार का शब्द है। तुमको हे शब्द नहीं कहना है। बाप को याद करना है। चिल्लाया तो गोया भक्ति का अंश आ गया। हे भगवान कहना भी भक्ति की आदत है। बाबा ने थोड़ेही कहा है  हे भगवान कहकर याद करो। अन्तर्मुख हो मुझे याद करो। सिमरण भी नहीं करना है। सिमरण भी भक्ति मार्ग का अक्षर है। तुमको बाप का परिचय मिलाअब बाप की श्रीमत पर चलो। ऐसे बाप को याद करो जैसे लौकिक बच्चे देहधारी बाप को याद करते हैं। खुद भी देह अभिमान में हैं तो याद भी देहधारी बाप को करते हैं। पारलौकिक बाप तो है ही देही अभिमानी। इसमें आते हैं तो भी देह अभिमानी नहीं होते। कहते हैं हमने यह लोन लिया हैतुमको ज्ञान देने लिए मैं यह लोन लेता हूँ। ज्ञान सागर हूँ परन्तु ज्ञान कैसे दूँ। गर्भ में तो तुम जाते होमैं थोड़ेही गर्भ में जाता हूँ। मेरी गति मत ही न्यारी है। बाप इसमें आते हैं। यह भी कोई नहीं जानते। कहते भी हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना। परन्तु कैसे ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैंक्या प्रेरणा देंगे! बाप कहते हैं मैं साधारण तन में आता हूँ। उसका नाम ब्रह्मा रखता हूँ क्योंकि सन्यास करते हैं ना।
तुम बच्चे जानते हो अभी ब्राह्मणों की माला नहीं बन सकती क्योंकि टूटते रहते हैं। जब ब्राह्मण फाइनल बन जाते हैं तब रूद्र माला बनती हैफिर विष्णु की माला में जाते हैं। माला में आने के लिए याद की यात्रा चाहिए। अभी तुम्हारी बुद्धि में है कि हम सो पहले पहले सतोप्रधान थे फिर सतो रजो तमो में आते हैं। हम सो का भी अर्थ है ना। ओम् का अर्थ अलग हैओम् माना आत्मा। फिर वही आत्मा कहती है हम सो देवता क्षत्रिय... वो लोग फिर कह देते हम आत्मा सो परमात्मा। तुम्हारा ओम और हम सो का अर्थ बिल्कुल अलग है। हम आत्मा हैं फिर आत्मा वर्णो में आती हैहम आत्मा सो पहले देवता क्षत्रिय बनते हैं। ऐसे नहीं कि आत्मा सो परमात्माज्ञान पूरा न होने के कारण अर्थ ही मुँझा दिया है। अहम् ब्रह्मस्मि कहते हैंयह भी रांग है। बाप कहते हैं मैं रचना का मालिक तो बनता नहीं। इस रचना के मालिक तुम हो। विश्व के भी मालिक तुम बनते हो। ब्रह्म तो तत्व है। तुम आत्मा सो इस रचना के मालिक बनते हो। अभी बाप सब वेदों शास्त्रों का यथार्थ अर्थ बैठ सुनाते हैं। अभी तो पढ़ते रहना है। बाप तुम्हें नई नई बातें समझाते रहते हैं। भक्ति क्या कहती हैज्ञान क्या कहता है। भक्ति मार्ग में मन्दिर बनायेजप तप कियेपैसा बरबाद किया। तुम्हारे मन्दिरों को बहुतों ने लूटा है। यह भी ड्रामा में पार्ट है फिर जरूर उन्हों से ही वापस मिलना है। अभी देखो कितना दे रहे हैं। दिन प्रतिदिन बढ़ाते रहते हैं। यह भी लेते रहते हैं। उन्होंने जितना लिया है उतना ही पूरा हिसाब देंगे। तुम्हारे पैसे जो खाये हैंवह हप नहीं कर सकते। भारत तो अविनाशी खण्ड है ना। बाप का बर्थ प्लेस है। यहाँ ही बाप आते हैं। बाप के खण्ड से ही ले जाते हैं तो वापिस देना पड़े। समय पर देखो कैसे मिलता है। यह बातें तुम जानते हो। उनको थोड़ेही पता है  विनाश किस समय आयेगा। गवर्मेन्ट भी यह बातें मानेंगी नहीं। ड्रामा में नूँध हैकर्जा उठाते ही रहते हैं। रिटर्न हो रहा है। तुम जानते हो हमारी राजधानी से बहुत पैसे ले गये हैंसो फिर दे रहे हैं। तुमको कोई बात का फिकर नहीं है। फिकर रहता है सिर्फ बाप को याद करने का। याद से ही पाप भस्म होंगे। नॉलेज तो बहुत सहज है। अब जो जितना पुरूषार्थ करे। श्रीमत तो मिलती रहती है। अविनाशी सर्जन से हर बात में मत लेनी पड़े। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) जितना टाइम मिले उतना टाइम यह रूहानी धंधा करना है। रूहानी धंधे के संस्कार डालने हैं। पतितों को पावन बनाने की सर्विस करनी है।
2) अन्तर्मुखी बन बाप को याद करना है। मुख से हे शब्द नहीं निकालना है। जैसे बाप को अहंकार नहींऐसे निरहंकारी बनना है।


वरदान:- बीजरूप स्थिति द्वारा सारे विश्व को लाइट का पानी देने वाले विश्व कल्याणकारी भव!   

बीजरूप स्टेज सबसे पावरफुल स्टेज हैयही स्टेज लाइट हाउस का कार्य करती हैइससे सारे विश्व में लाइट फैलाने के निमित्त बनते हो। जैसे बीज द्वारा स्वतः ही सारे वृक्ष को पानी मिल जाता है ऐसे जब बीजरूप स्टेज पर स्थित रहते हो तो विश्व को लाइट का पानी मिलता है। लेकिन सारे विश्व तक अपनी लाइट फैलाने के लिए विश्व कल्याणकारी की पावरफुल स्टेज चाहिए। इसके लिए लाइट हाउस बनो न कि बल्ब। हर संकल्प में स्मृति रहे कि सारे विश्व का कल्याण हो।

स्लोगन:- एडॅजेस्ट होने की शक्ति नाज़ुक समय पर पास विद आनॅर बना देगी। 

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